पृष्ठ

बुधवार, 25 अगस्त 2010

समय का पहिया / गोरख पाण्डेय

समय का पहिया चले रे साथी
समय का पहिया चले
फ़ौलादी घोंड़ों की गति से आग बरफ़ में जले रे साथी
समय का पहिया चले
रात और दिन पल पल छिन
आगे बढ़ता जाय
तोड़ पुराना नये सिरे से
सब कुछ गढ़ता जाय
पर्वत पर्वत धारा फूटे लोहा मोम सा गले रे साथी
समय का पहिया चले
उठा आदमी जब जंगल से
अपना सीना ताने
रफ़्तारों को मुट्ठी में कर
पहिया लगा घुमाने
मेहनत के हाथों से
आज़ादी की सड़के ढले रे साथी
समय का पहिया चले

उनका डर / गोरख पाण्डेय

वे डरते हैं

किस चीज़ से डरते हैं वे

तमाम धन-दौलत

गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ?

वे डरते हैं

कि एक दिन

निहत्थे और ग़रीब लोग

उनसे डरना

बंद कर देंगे ।

इंकलाब का गीत / गोरख पाण्डेय

हमारी ख्वाहिशों का नाम इन्क़लाब है,

हमारी ख्वाहिशों का सर्वनाम इन्क़लाब है,

हमारी कोशिशों का एक नाम इन्क़लाब है,

हमारा आज एकमात्र काम इन्क़लाब है,

ख़तम हो लूट किस तरह जवाब इन्क़लाब है,

ख़तम हो किस तरह सितम जवाब इन्कलाब है,

हमारे हर सवाल का जवाब इन्क़लाब है,

सभी पुरानी ताकतों का नाश इन्क़लाब है,

सभी विनाशकारियों का नाश इन्क़लाब है,

हरेक नवीन सृष्टि का विकास इन्क़लाब है,

विनाश इन्क़लाब है विकास इन्क़लाब है,

सुनो कि हम दबे हुओं की आह इन्कलाब है,

खुलो कि मुक्ति की खुली निगाह इन्क़लाब है,

उठो कि हम गिरे हुओं की राह इन्क़लाब है,

चलो बढ़े चलो युग प्रवाह इन्क़लाब है ।

पैसे का गीत / गोरख पाण्डेय


पैसे की बाहें हज़ार अजी पैसे की

महिमा है अपरम्पार अजी पैसे की

पैसे में सब गुण

पैसा है निर्गुण

उल्लू पर देवी सवार अजी पैसे की

पैसे के पण्डे

पैसे के झण्डे

डण्डे से टिकी सरकार अजी पैसे की

पैसे के गाने

पैसे की ग़ज़लें

सबसे मीठी झनकार अजी पैसे की

पैसे की अम्मा

पैसे के बप्पा

लपटों से बनी ससुराल अजी पैसे की

मेहनत से जिन्सें

जिन्सों के दुखड़े

दुखड़ों से आती बहार अजी पैसे की

सोने के लड्डू

चाँदी की रोटी

बढ़ जाए भूख हर बार अजी पैसे की

पैसे की लूटें

लूटों की फ़ौजें

दुनिया है घायल शिकार अजी पैसे की

पैसे के बूते

इंसाफ़ी जूते

खाए जा पंचों ! मार अजी पैसे की ।

काजू भुनी प्लेट में ह्विस्की गिलास में / अदम गोंडवी

काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में

आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में

पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में

जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में