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बुधवार, 15 अक्टूबर 2008

नागार्जुन की राजनीति विषयक कविताओं का मूल्यांकन महेंद्र सिंह मीना
नागार्जुन जनकवि हैं पर उनकी कविता खोखले नारों सा बर्ताव नहीं करती ,वह संवेदना और मर्म की कविता है| राजनीति नागार्जुन को खास आकर्षित करती है | तात्कालिक राजनितिक घटनाओं पर लिखी उनकी कविताओं में असाधारण सरलता है, साथ ही तीखा व्यंग भी |मुक्तिबोध की तरह उनहोंने समूची राजनितिक व्यवस्था को पद्व्द्द नहीं किया है बल्कि घटनाओं, व्यक्तियों आदि के चलते निम्नवर्गीय मानसिकता में उठने वाली अनुभूतियों को स्वर दिया है| 'आओ रानी हम धोएँगे पालकी'या 'आए दिन वहार के' या 'इन्दूजी इन्दूजी क्या हो गया आपको'आदि कविताओं में राजनीति की तात्कालिकता पर व्यंग ही नहीं है, बल्कि राजनीति का स्थायी चेहरा भी है|
नागार्जुन एक प्रतिवद्ध कवि हैं | उनकी प्रतिवद्धता कोई संकुचित नहीं है, वह मानवीय कल्याण के विराट सपने से जुड़ी हुई है | उनकी प्रतिवद्यता जीवन ,जीवन के संघर्ष ,और जीवन के सौन्दर्य के प्रति है |कहना न कि यह जीवन समाज के मेहनतकश लोगों का जीवन है | नागार्जुन अपने समय की सारी समस्याओं से टकराते हैं वे समस्याएं चाहे राजनितिक हों,आर्थिक हो, या सामाजिक,एक युग की धड़कन उनके साहित्य में है|



सोमवार, 13 अक्टूबर 2008

प्रेमचंद की दलित विषयक कहानियाँ और हमारा समय

प्रेमचंद की दलित विषयक कहानियाँ और हमारा समय _ महेंद्र सिंह मीना
प्रेमचंद की दलित कहानियों का मूल्यांकन दो तरह से किया जा
सकता है ,पहला आधार यह है की प्रेमचंद की दलित विषयक और उनसे मिलती जुलती कहानियों को केन्द्र में रखकर आज के दलित आन्दोलन का मूल्यांकन किया जाए | दूसरा आधार यह बचता है कि आज के दलित आन्दोलन को केन्द्र में रखकर प्रेमचंद की कहानियों का मूल्यांकन किया जाए |आज के दलित लेखकों का मानना है कि दलित कहानियों में केवल उन्हीं कहानियों को रखा जा सकता है जिनमे दलित समस्या को उजागर किया गया हो ,उसके लिए आर्थिक समस्या के उजागर होने के साथ-साथ सामाजिक समस्या का उल्लेख होना जरूरी है क्योकिं आर्थिक समस्या तो सवर्णों में भी हो सकती है |इसके साथ ही इस प्रश्न में यह भी देखना होगा कि प्रेमचंद के पात्रों एवं उस समाज में आज कितना परिवर्तन हुआ है और आज के दौर में प्रेमचंद कि दलित कहानियाँ कहाँ ठहरती है?.....................|

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2008

१९वी सदी में नवजागरण के विकास में हिन्दी निबंधों की भूमिका महेंद्र सिंह मीना
हिन्दी नवजागरण के विकास में हिन्दी निबंधों की भूमिका के बारे में चर्चा करने से पहले मैं हिन्दी नवजागरण के बारे में अपने विचार रखना चाहूँगा कि हिन्दी नवजागरण क्या है ?डॉ.रामविलास शर्मा का मानना है कि हिन्दी नवजागरण हिन्दी भाषी प्रदेश में प्रचलित राष्ट्रीय जागरण कि साहित्यिक अभिव्यक्ति है ,किंतु मेरा मानना है कि १९ वी सदी में हिन्दी प्रदेश में ऐसा कोई आन्दोलन नहीं चल रहा था | जो भी आन्दोलन चल रहे थे; बे हिन्दी प्रदेश से बहुत दूर थे, प.बंगाल या महारास्ट्र में | अत १९ वी सदी के हिन्दी नवजागरण को केवल हिन्दी प्रदेश से जोड़ना उचित नहीं होगा |वास्तव में यह रास्ट्रीय नवजागरण कि साहित्यिक अभिव्यक्ति है |
१९ वी सदी में नवजागरण की उत्पत्ति यकायक ही नहीं होती है इसमें पाश्चात विचारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है | पहली वार आधुनिक सिच्छा प्रणाली की शुरूआत होती है